मशहूर डांसर-एक्ट्रेस मधु कांबिकर का निधन; लावणी और थिएटर को बड़ा झटका
पुणे: मशहूर डांसर और एक्ट्रेस मधु कांबिकर (उम्र 73), जिन्होंने लोक कला, थिएटर और फिल्म के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई, का लंबी बीमारी के बाद सोमवार (12 अक्टूबर) को पुणे में निधन हो गया। 2016 में स्ट्रोक के कारण वह बिस्तर पर थीं। उन्होंने यरवदा में अपने घर पर आखिरी सांस ली। उनके निधन से फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ लावणी और थिएटर सेक्टर में भी दुख फैल गया है। उनके परिवार में एक बेटा, बहू और पोते-पोतियां हैं।
मधु कांबिकर का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए शास्त्री नगर, यरवदा में रखा गया था। बाद में, शाम को श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। इस मौके पर विट्ठल वाघ, मासप के कोषाध्यक्ष प्रदीप निफाड़कर, सुरेश वैरालकर, शाहिर दादा पासलकर और अलग-अलग क्षेत्रों के अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे। 2016 में, एक मराठी थिएटर इवेंट में डांस करते समय मधु कांबिकर को अचानक चक्कर आया और वह गिर गईं। उसके बाद, उनकी ब्रेन सर्जरी हुई। हालांकि, उनकी सेहत में उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं हुआ। वह पिछले कई सालों से गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम का सामना कर रही थीं।
मधु कांबिकर का जन्म 28 जुलाई, 1953 को मालेगांव, गेवराई तालुका, बीड जिले में हुआ था। उनका असली नाम मधु वामन जाधव था। क्योंकि उनके पिता एक आर्टिस्ट थे, इसलिए बचपन से ही उनमें कला के बीज पड़ गए थे। चूंकि उन्हें पढ़ाई में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उनका करियर तमाशा के फील्ड में शुरू हुआ। 13-14 साल की उम्र से, उन्होंने पांडुरंग घोटीकर और लावणी साम्राज्ञी लक्ष्मीबाई कोल्हापुरकर से तमाशा सीखा।
राजदत्त की डायरेक्ट की हुई फिल्म ‘शापित’ से उन्हें खास पहचान मिली। उसके बाद उन्होंने ‘रघु मैना’, ‘हेच माझा माहेर’, ‘एक होता विदूषक’, ‘रावसाहेब’, ‘झपटलेला’, ‘झपटलेला 2’, ‘स्त्री जन्म ही तूजी कहानी’, ‘माला लोंडे चला’, ‘येऊ का घरात’, ‘बिनकामाचा नवरा’, ‘धोंडी धोंडी पानी दे’, ‘देबू’, ‘संत गाडगे महाराज’, ‘संघर्ष जीवनी’ और ‘अभ्रक’ जैसी कई फिल्मों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। खासकर ‘एक होता विदूषक’ में उनकी भूमिका, ‘झपटलेला’ में लक्ष्य की मां का किरदार और ‘देबू’ फिल्म में संत गाडगे महाराज की मां की भूमिका दर्शकों के जेहन में बस गई। मराठी के साथ-साथ उन्होंने ‘हम दोनों’, ‘सातवाँ आसमान’, ‘अपनापन’, ‘यशवंत’ और ‘शोला और शबनम’ जैसी हिंदी फिल्मों में भी काम किया। गुजराती फिल्म ‘साद’ में भी उनके काम की तारीफ़ हुई। उन्होंने ‘पुत्रकामेष्टि’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘चंद्र झरन उगवत नहीं’, ‘आकाश पलटना’, ‘सुर राहु दे’, ‘लावणी भुल्ली अभंगला’, ‘आमदार सौभाग्यवती’, ‘फूलवंती’ और ‘सखी माझी लावणी’ जैसे नाटकों में स्टेज पर काम किया। दादू इंदुरिकर के लोक नाटकों से भी उनका नाम जुड़ा। उन्होंने ‘होली रे होली’, ‘सरजा राजा’, ‘वैभव’, ‘श्रवंधरा’ और ‘मुक्ति’ जैसे टीवी सीरियल में भी दर्शकों से जुड़ाव महसूस किया। मधु काम्बिकर ने 1985 में ‘हेच माझा माहेर’ और 1996 में ‘रावसाहेब’ के लिए महाराष्ट्र सरकार का बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड जीता था। उन्हें गुजरात राज्य सरकार का अवॉर्ड भी मिला था।
पुणे: मशहूर डांसर और एक्ट्रेस मधु कांबिकर (उम्र 73), जिन्होंने लोक कला, थिएटर और फिल्म के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई, का लंबी बीमारी के बाद सोमवार (12 अक्टूबर) को पुणे में निधन हो गया। 2016 में स्ट्रोक के कारण वह बिस्तर पर थीं। उन्होंने यरवदा में अपने घर पर आखिरी सांस ली। उनके निधन से फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ लावणी और थिएटर सेक्टर में भी दुख फैल गया है। उनके परिवार में एक बेटा, बहू और पोते-पोतियां हैं।
मधु कांबिकर का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए शास्त्री नगर, यरवदा में रखा गया था। बाद में, शाम को श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। इस मौके पर विट्ठल वाघ, मासप के कोषाध्यक्ष प्रदीप निफाड़कर, सुरेश वैरालकर, शाहिर दादा पासलकर और अलग-अलग क्षेत्रों के अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे। 2016 में, एक मराठी थिएटर इवेंट में डांस करते समय मधु कांबिकर को अचानक चक्कर आया और वह गिर गईं। उसके बाद, उनकी ब्रेन सर्जरी हुई। हालांकि, उनकी सेहत में उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं हुआ। वह पिछले कई सालों से गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम का सामना कर रही थीं।
मधु कांबिकर का जन्म 28 जुलाई, 1953 को मालेगांव, गेवराई तालुका, बीड जिले में हुआ था। उनका असली नाम मधु वामन जाधव था। क्योंकि उनके पिता एक आर्टिस्ट थे, इसलिए बचपन से ही उनमें कला के बीज पड़ गए थे। चूंकि उन्हें पढ़ाई में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उनका करियर तमाशा के फील्ड में शुरू हुआ। 13-14 साल की उम्र से, उन्होंने पांडुरंग घोटीकर और लावणी साम्राज्ञी लक्ष्मीबाई कोल्हापुरकर से तमाशा सीखा।
राजदत्त की डायरेक्ट की हुई फिल्म ‘शापित’ से उन्हें खास पहचान मिली। उसके बाद उन्होंने ‘रघु मैना’, ‘हेच माझा माहेर’, ‘एक होता विदूषक’, ‘रावसाहेब’, ‘झपटलेला’, ‘झपटलेला 2’, ‘स्त्री जन्म ही तूजी कहानी’, ‘माला लोंडे चला’, ‘येऊ का घरात’, ‘बिनकामाचा नवरा’, ‘धोंडी धोंडी पानी दे’, ‘देबू’, ‘संत गाडगे महाराज’, ‘संघर्ष जीवनी’ और ‘अभ्रक’ जैसी कई फिल्मों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। खासकर ‘एक होता विदूषक’ में उनकी भूमिका, ‘झपटलेला’ में लक्ष्य की मां का किरदार और ‘देबू’ फिल्म में संत गाडगे महाराज की मां की भूमिका दर्शकों के जेहन में बस गई। मराठी के साथ-साथ उन्होंने ‘हम दोनों’, ‘सातवाँ आसमान’, ‘अपनापन’, ‘यशवंत’ और ‘शोला और शबनम’ जैसी हिंदी फिल्मों में भी काम किया। गुजराती फिल्म ‘साद’ में भी उनके काम की तारीफ़ हुई। उन्होंने ‘पुत्रकामेष्टि’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘चंद्र झरन उगवत नहीं’, ‘आकाश पलटना’, ‘सुर राहु दे’, ‘लावणी भुल्ली अभंगला’, ‘आमदार सौभाग्यवती’, ‘फूलवंती’ और ‘सखी माझी लावणी’ जैसे नाटकों में स्टेज पर काम किया। दादू इंदुरिकर के लोक नाटकों से भी उनका नाम जुड़ा। उन्होंने ‘होली रे होली’, ‘सरजा राजा’, ‘वैभव’, ‘श्रवंधरा’ और ‘मुक्ति’ जैसे टीवी सीरियल में भी दर्शकों से जुड़ाव महसूस किया। मधु काम्बिकर ने 1985 में ‘हेच माझा माहेर’ और 1996 में ‘रावसाहेब’ के लिए महाराष्ट्र सरकार का बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड जीता था। उन्हें गुजरात राज्य सरकार का अवॉर्ड भी मिला था।
मधु कांबिकर का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए शास्त्री नगर, यरवदा में रखा गया था। बाद में, शाम को श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। इस मौके पर विट्ठल वाघ, मासप के कोषाध्यक्ष प्रदीप निफाड़कर, सुरेश वैरालकर, शाहिर दादा पासलकर और अलग-अलग क्षेत्रों के अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे। 2016 में, एक मराठी थिएटर इवेंट में डांस करते समय मधु कांबिकर को अचानक चक्कर आया और वह गिर गईं। उसके बाद, उनकी ब्रेन सर्जरी हुई। हालांकि, उनकी सेहत में उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं हुआ। वह पिछले कई सालों से गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम का सामना कर रही थीं।
मधु कांबिकर का जन्म 28 जुलाई, 1953 को मालेगांव, गेवराई तालुका, बीड जिले में हुआ था। उनका असली नाम मधु वामन जाधव था। क्योंकि उनके पिता एक आर्टिस्ट थे, इसलिए बचपन से ही उनमें कला के बीज पड़ गए थे। चूंकि उन्हें पढ़ाई में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उनका करियर तमाशा के फील्ड में शुरू हुआ। 13-14 साल की उम्र से, उन्होंने पांडुरंग घोटीकर और लावणी साम्राज्ञी लक्ष्मीबाई कोल्हापुरकर से तमाशा सीखा।
राजदत्त की डायरेक्ट की हुई फिल्म ‘शापित’ से उन्हें खास पहचान मिली। उसके बाद उन्होंने ‘रघु मैना’, ‘हेच माझा माहेर’, ‘एक होता विदूषक’, ‘रावसाहेब’, ‘झपटलेला’, ‘झपटलेला 2’, ‘स्त्री जन्म ही तूजी कहानी’, ‘माला लोंडे चला’, ‘येऊ का घरात’, ‘बिनकामाचा नवरा’, ‘धोंडी धोंडी पानी दे’, ‘देबू’, ‘संत गाडगे महाराज’, ‘संघर्ष जीवनी’ और ‘अभ्रक’ जैसी कई फिल्मों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। खासकर ‘एक होता विदूषक’ में उनकी भूमिका, ‘झपटलेला’ में लक्ष्य की मां का किरदार और ‘देबू’ फिल्म में संत गाडगे महाराज की मां की भूमिका दर्शकों के जेहन में बस गई। मराठी के साथ-साथ उन्होंने ‘हम दोनों’, ‘सातवाँ आसमान’, ‘अपनापन’, ‘यशवंत’ और ‘शोला और शबनम’ जैसी हिंदी फिल्मों में भी काम किया। गुजराती फिल्म ‘साद’ में भी उनके काम की तारीफ़ हुई। उन्होंने ‘पुत्रकामेष्टि’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘चंद्र झरन उगवत नहीं’, ‘आकाश पलटना’, ‘सुर राहु दे’, ‘लावणी भुल्ली अभंगला’, ‘आमदार सौभाग्यवती’, ‘फूलवंती’ और ‘सखी माझी लावणी’ जैसे नाटकों में स्टेज पर काम किया। दादू इंदुरिकर के लोक नाटकों से भी उनका नाम जुड़ा। उन्होंने ‘होली रे होली’, ‘सरजा राजा’, ‘वैभव’, ‘श्रवंधरा’ और ‘मुक्ति’ जैसे टीवी सीरियल में भी दर्शकों से जुड़ाव महसूस किया। मधु काम्बिकर ने 1985 में ‘हेच माझा माहेर’ और 1996 में ‘रावसाहेब’ के लिए महाराष्ट्र सरकार का बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड जीता था। उन्हें गुजरात राज्य सरकार का अवॉर्ड भी मिला था।
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